NewsShot.in | September2, 2026 | New Delhi
भारत का सामान निर्यात का लक्ष्य FY2026-27 (merchandise export target FY2026-27) में करीब $530 billion है। लेकिन बदलती अमेरिकी टैरिफ नीति भारतीय निर्यातकों के लिए कीमतों की प्रतिस्पर्धा, ऑर्डर और निवेश, इन तीनों पर दबाव बढ़ा सकती है।
भारत ने FY2026-27 में वस्तुओं के निर्यात को करीब ₹50.30 लाख करोड़ ($530 billion) तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जुलाई 2026 में कहा था कि वस्तुओं के निर्यात में लगभग 16–17% वृद्धि की जरूरत होगी। दूसरी ओर, अमेरिका की बदलती टैरिफ पॉलिसी भारतीय निर्यातकों के लिए अनिश्चितता बढ़ा रही है।
क्या है असली समस्या?
फरवरी 2026 में भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार ढाँचा ( India-U.S. interim trade framework) के तहत कई भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका के पारस्परिक टैरिफ (reciprocal tariff) को 18% करने की व्यवस्था बनी थी। बाद में जुलाई में अमेरिका ने जबरन मजदूरी से जुड़े प्रतिबंधों की धारा 301 की कार्रवाई के तहत भारत सहित कई देशों के सामान पर अतिरिक्त 10% टैरिफ तय किया। यानी अलग-अलग वस्तुओं पर लागू कर को केवल 10% टैरिफ या 18% टैरिफ कहकर समझना सही नहीं होगा।

निर्यात पर पांच बड़े असर
1. भारतीय सामान महंगा हो सकता है
टैरिफ अमेरिकी आयातक देता है, लेकिन उसका असर अक्सर निर्यातक तक पहुंचता है। खरीदार भारतीय सप्लायर से कीमत कम करने को कह सकता है।
2. ऑर्डर दूसरे देशों में जा सकते हैं
अगर वियतनाम, बांग्लादेश, इंडोनेशिया या दूसरे कॉम्पिटिटर का लैंडेड कॉस्ट कम पड़ता है, तो अमेरिकन बायर्स सोर्सिंग बदल सकते हैं।
3. निर्यातकों का मार्जिन घट सकता है
खरीदार को बनाए रखने के लिए भारतीय कंपनी टैरिफ का कुछ हिस्सा अपने मार्जिन खपा कर सकती है।
4. फैक्ट्री का विस्तार टल सकता है
जब निर्यातकों को यह भरोसा न हो कि अगले कुछ महीनों में टैरिफ कितना रहेगा, तो नई फैक्ट्री, मशीनें और हायरिंग पर निवेश रोकने का फैसला लिया जा सकता है।
5. लंबे समय के अनुबंध करने में मुश्किल
टैरिफ की अनिश्चितता के कारण अमेरिकी खरीदार लंबे अनुबंध करने में सावधानी बरत सकते हैं।

किन सेक्टरों पर अमेरिकी टैरिफ का ज्यादा असर?
सबसे ज्यादा चिंता उन क्षेत्रों को है जहां कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा और श्रम लागत महत्वपूर्ण है।
- कपड़ा और परिधान (Textiles & apparel)
- लेदर और फुटवियर (Leather & footwear)
- रत्न और आभूषण (Gems & jewellery)
- समुद्री उत्पाद (Marine products)
- इंजीनियरिंग का सामान (Engineering goods)
- ऑटो पार्ट्स (Auto components)
- रसायन (Chemicals)
अगस्त 2026 में संसदीय समिति ने भी टेक्सटाइल, रत्न और आभूषण, चमड़ा और समुद्री उत्पाद जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर पर अमेरिकी टैरिफ उपायों के असर को लेकर चिंता और एक्सपोर्टर्स को टारगेटेड सपोर्ट देने की सिफारिश की।
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क्या भारत फिर भी $530 Billion target हासिल कर सकता है?
अभी तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। भारत की वस्तुओं के निर्यात ने FY2026-27 के पहले चार महीनों यानी अप्रैल-जुलाई में $173.78 billion का स्तर हासिल किया, जो पिछले साल की समान अवधि से 17.04% अधिक है। इलेक्ट्रॉनिक सामान, पेट्रोलियम उत्पाद और इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों ने विकास को समर्थन दिया।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिकी टैरिफ के कारण भारत का निर्यात लक्ष्य निश्चित रूप से मिस होगा। लेकिन चुनौती बड़ी है। भारत को अगले महीनों में तेज निर्यात में वृद्धि बनाए रखने के साथ-साथ अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बचानी होगी।

सेवाओं का निर्यात को फायदा?
कस्टम्स टैरिफ मुख्य रूप से फिजिकल गुड्स पर लागू होते हैं। इसलिए IT, सॉफ्टवेयर और कई बिज़नेस सर्विसेज़ सीधे मर्चेंडाइज़ टैरिफ के दायरे में नहीं आते। यह भारत के लिए एक ज़रूरी कुशन है।
भारत की लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी भी सिर्फ U.S. मार्केट पर निर्भर रहने के बजाय यूरोप, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया जैसे मार्केट में डाइवर्सिफिकेशन बढ़ाने की है।
भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा सिर्फ टैरिफ की एक संख्या नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी टैरिफ को लेकर अनिश्चितता है।
अगर भारतीय निर्यातकों को बार-बार ड्यूटी, कम्प्लायंस की ज़रूरतों और मार्केट-एक्सेस की शर्तों का सामना करना पड़ता है, तो ऑर्डर, मार्जिन और इन्वेस्टमेंट, तीनों प्रभावित हो सकते हैं।
लेकिन मज़बूत घरेलू मैन्युफ़ैक्चरिंग, बेहतर लॉजिस्टिक्स, नए ट्रेड एग्रीमेंट और एक्सपोर्ट-मार्केट डाइवर्सिफ़िकेशन के ज़रिए भारत इस दबाव को काफी हद तक कम कर सकता है।