Patriarchy: मानसिक गुलामी से मुक्ति के बिना आजादी अधूरी है

क्या महिलाओं को इन नारों से आगे की सोचना होगा..
क्यूटी नहीं, क्रांति हूं…
लेकिन असली लड़ाई क्या है?
“एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा!”
“एक सुट्टा, दो चाय… मर्द जात हाय-हाय!”
“क्यूटी नहीं, क्रांति हूं!”
“रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं!”
और एक नारा—
“बेटी की लोकेशन नहीं, बेटे का इंटेंट चेक करो!”

Patriarchy यानी पितृसत्ता को चुनौती दिए बिना लड़ाई अधूरी ही रहेगी। कितने भी स्लोगन क्यों न लगा लें लेकिन जब तक Patriarchy को अपने दिमाग से नहीं निकालोगी यानि कि जब तक मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं होगी तक तक सामाजिक बदलाव असंभव है।

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