₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती

NewsShot.in | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026

₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने MRP, दवा की कीमत और मरीजों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को लेकर गंभीर सवाल उठाए।

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवाओं की कीमत पहले से ही मरीज और उसके परिवार के लिए बड़ी चिंता होती है। ऐसे में जब किसी दवा की रिटेलर कीमत करीब ₹2,700 हो और उसकी अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP ₹27,000 बताई जाए, तो सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, बल्कि पूरी pricing व्यवस्था का उठता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 22 सितंबर को ऐसी ही एक स्थिति पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने दवा की कीमत में करीब दस गुना अंतर को लेकर सवाल उठाते हुए इसे “daylight robbery” यानी दिन-दहाड़े लूट और “broad daylight dacoity” जैसे शब्दों में वर्णित किया। मामला कैंसर की जरूरी दवाओं की कीमत, अस्पतालों की फार्मेसी और दवाओं पर मुनाफे से जुड़े दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई से जुड़ा था।

₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती
₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती

₹2,700 और ₹27,000 का अंतर क्यों?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि कुछ जरूरी कैंसर दवाएं रिटेलर को लगभग ₹2,700 में उपलब्ध होती हैं, जबकि उनकी MRP करीब ₹27,000 तक बताई गई। पीठ ने सवाल किया कि जब दवा की खरीद कीमत इतनी कम है तो मरीज से इतनी अधिक कीमत क्यों ली जा रही है और संबंधित अधिकारी इस तरह के अंतर पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ₹2,700 से ₹27,000 का पूरा अंतर सीधे किसी एक कंपनी का मुनाफा है, ऐसा अदालत ने अंतिम रूप से तय नहीं किया है। दवा की कीमत की पूरी श्रृंखला में निर्माता, स्टॉकिस्ट, रिटेलर और अस्पताल जैसे अलग-अलग पक्ष शामिल हो सकते हैं।

₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती
₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती

निजी अस्पतालों की फार्मेसी पर भी सवाल

सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की अनुमति नहीं देते और उन्हें अस्पताल की अपनी फार्मेसी से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।

याचिकाओं में यह भी आरोप लगाया गया कि मरीजों को अपेक्षाकृत सस्ती generic medicines के विकल्प पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं कराए जाते। हालांकि ये याचिकाकर्ताओं के आरोप हैं, अदालत द्वारा अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।

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सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत दवाओं के reimbursement को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने चिंता जताई कि यदि अस्पताल महंगी MRP पर दवाएं खरीदते हैं और बाद में सरकारी योजनाओं के तहत उनका भुगतान लिया जाता है, तो इसका असर public funds यानी करदाताओं के पैसे पर पड़ सकता है।

यानी सवाल केवल मरीज की जेब तक सीमित नहीं है। यदि दवाओं की कीमत और वास्तविक खरीद लागत के बीच बहुत बड़ा अंतर हो, तो सरकारी reimbursement व्यवस्था पर भी उसका असर पड़ सकता है।

₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती
₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिन-दहाड़े डकैती

दवाओं की कीमत नियंत्रित करने की व्यवस्था पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट में Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा भी उठा। रिपोर्टों के अनुसार अदालत के सामने यह बात रखी गई कि बड़ी संख्या में दवाएं price ceiling के दायरे से बाहर हैं और non-scheduled medicines की शुरुआती कीमत तय करने को लेकर नियामकीय व्यवस्था में अंतर है।

यही वजह है कि अदालत के सामने सवाल सिर्फ एक कैंसर दवा का नहीं, बल्कि यह है कि जरूरी दवाओं की MRP और उनके वास्तविक खरीद मूल्य के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों और कैसे संभव है।

असली सवाल मरीज का है

कैंसर का इलाज पहले ही परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव डाल सकता है। ऐसे में दवाओं की कीमत में पारदर्शिता और उचित मूल्य निर्धारण मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी फिलहाल सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी है, अंतिम फैसला नहीं। लेकिन ₹2,700 और ₹27,000 का उदाहरण दवाओं की pricing व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है।

दवा की कीमत कौन तय करता है, MRP और वास्तविक खरीद कीमत में इतना अंतर क्यों है और इसकी निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है?

इन्हीं सवालों के जवाब अब इस मामले की आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण होंगे।

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