Supreme Court ने कहा कि गिरफ्तारी का आधार लिखित में और समझ आने वाली भाषा में बताना जरूरी है। यह संवैधानिक सुरक्षा UAPA जैसे मामलों में भी लागू होगी।
गिरफ्तारी हुई तो जानिए आपका अधिकार क्या है? UAPA पर भी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के आधार यानी किस वजह से गिरफ्तार किया जा रहा है, इसकी जानकारी लिखित रूप में देनी होगी। यह जानकारी ऐसी भाषा में होनी चाहिए जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझ सके।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह संवैधानिक सुरक्षा केवल सामान्य आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है। UAPA और PMLA जैसे विशेष कानूनों के तहत होने वाली गिरफ्तारियों में भी यह नियम लागू होगा। अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, संविधान में मिले मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस उज्जल भुइयां और अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना महज एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा है।
कोर्ट के अनुसार, जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है। इसलिए उसे यह पता होना जरूरी है कि आखिर उसे किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है।
अगर गिरफ्तारी के आधार की जानकारी निर्धारित तरीके से नहीं दी जाती है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है और ऐसी गिरफ्तारी को गैरकानूनी माना जा सकता है।

UAPA में भी यही नियम
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस संवैधानिक सुरक्षा को UAPA जैसे कठोर विशेष कानूनों से जुड़े मामलों में भी लागू माना है।
UAPA यानी Unlawful Activities (Prevention) Act आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े मामलों में इस्तेमाल होने वाला विशेष कानून है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी और जमानत के प्रावधान सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में अलग और अधिक कठोर हो सकते हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध की गंभीरता अपने आप में संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती।
अगर गिरफ्तारी गैरकानूनी घोषित हो जाए तो दोबारा गिरफ्तारी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात कही है।
अगर किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी अनुच्छेद 22 के पालन में कमी के कारण गैरकानूनी घोषित हो जाती है, तो उसी मामले में पुलिस उसे दोबारा गिरफ्तार करने के लिए मनमाने ढंग से आगे नहीं बढ़ सकती।
ऐसी स्थिति में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मंजूरी और संबंधित अदालत की अनुमति जरूरी होगी। यानी संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन करके की गई गिरफ्तारी के बाद प्रक्रिया को सामान्य तरीके से दोहराया नहीं जा सकता।

इस फैसले का मतलब क्या है?
सुप्रीम कोर्ट का संदेश मूल रूप से यह है कि कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों में भी गिरफ्तारी की संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
गिरफ्तार व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उसके खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर की गई है। इससे वह अपने वकील से प्रभावी तरीके से सलाह ले सकता है और रिमांड या जमानत की कार्यवाही में अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी UAPA और PMLA से जुड़े मामलों में गिरफ्तारी के आधार को लिखित रूप में उपलब्ध कराने के महत्व पर जोर दे चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों की व्याख्या अपराध की गंभीरता के आधार पर संकुचित नहीं की जा सकती। संविधान में दिए गए अधिकारों और गिरफ्तारी की प्रक्रिया का पालन हर मामले में महत्वपूर्ण है।