BRICS 2026: भारत के सामने क्यों है बड़ी कूटनीतिक चुनौती

NewsShot.in | September 11, 2026 | New Delhi

BRICS 2026 में युद्ध, रूस-चीन संबंध, ईरान विवाद और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर भारत की बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। जानिए भारत की रणनीति।

नई दिल्ली: भारत 12 और 13 सितंबर को 18वें BRICS 2026 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। नई दिल्ली के भारत मंडपम में हो रहे इस सम्मेलन में दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ कई बड़े वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होगी। हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान संकट, अमेरिका के साथ बढ़ता तनाव और भारत-चीन संबंध जैसे मुद्दे BRICS की एकता के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कोशिश BRICS को केवल पश्चिम विरोधी मंच के रूप में पेश करने के बजाय ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के लिए एक रचनात्मक और व्यावहारिक मंच के तौर पर स्थापित करने की है।

BRICS की बढ़ती आर्थिक ताकत

BRICS की आर्थिक ताकत इस सम्मेलन का एक प्रमुख मुद्दा है। शुक्रवार को हुए BRICS बिजनेस फोरम में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने BRICS की तुलना G7 से करते हुए कहा कि पिछले पांच वर्षों में BRICS देशों का वैश्विक GDP में योगदान 40 प्रतिशत से अधिक रहा है, जबकि G7 का योगदान करीब 29 प्रतिशत रहा।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी BRICS के बढ़ते प्रभाव पर जोर दिया। उनके अनुसार, BRICS देश दुनिया की करीब 50 प्रतिशत आबादी, 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और 25 प्रतिशत से अधिक वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, BRICS देशों का निर्यात 2003 में करीब 900 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर हो गया है। संगठन का विस्तार भी हुआ है और अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं।

BRICS 2026: भारत के सामने क्यों है बड़ी कूटनीतिक चुनौती
BRICS 2026: भारत के सामने क्यों है बड़ी कूटनीतिक चुनौती

व्यापार और डिजिटल पेमेंट पर भारत का जोर

भारत BRICS के माध्यम से व्यापार और निवेश को आसान बनाने पर विशेष जोर दे रहा है। बिजनेस फोरम में 2,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और 600 से ज्यादा बिजनेस-टू-बिजनेस बैठकें हुईं।

भारत ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। भारत की UPI व्यवस्था को इसका एक उदाहरण बताया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS बिजनेस काउंसिल से समूह के सामने मौजूद शीर्ष 10 व्यापार बाधाओं की पहचान करने को कहा है।

उन्होंने हर साल 100 BRICS स्टार्टअप्स को दूसरे सदस्य देशों के बाजारों में विस्तार में मदद करने और 1,000 नई कारोबारी साझेदारियां बनाने का भी प्रस्ताव रखा है। भारत के लिए इंजीनियरिंग, फार्मा, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नए बाजार हासिल करना महत्वपूर्ण है।

युद्धों ने बढ़ाई BRICS की मुश्किल

BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक है। ईरान और यूएई जैसे सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष को लेकर अलग-अलग हित हैं। ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच संघर्ष तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर भी असर डाला है।

मई में BRICS के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अलग-अलग देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक साझा घोषणा तैयार कराए।

BRICS 2026: मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात पर नजर

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा भी इस सम्मेलन का बड़ा आकर्षण होगी। 2019 के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा है। 2020 के सीमा विवाद के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव बना हुआ है, हालांकि दोनों देशों ने हाल के वर्षों में संबंधों को स्थिर करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं।

मोदी और शी की संभावित मुलाकात में सीमा पर शांति, व्यापार और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर चर्चा हो सकती है। हालांकि इसे भारत-चीन संबंधों में पूर्ण बदलाव के संकेत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अभी भी जारी है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है BRICS 2026?

भारत इस सम्मेलन के जरिए रूस, चीन, ईरान और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश करेगा, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते भी बनाए रखना चाहता है।

भारत BRICS में स्थानीय मुद्रा में व्यापार, डिजिटल पेमेंट, टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जलवायु जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाना चाहता है। लेकिन सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा एक साझा घोषणा पर सहमति बनाने की होगी।

अगर भारत सदस्य देशों के मतभेदों के बावजूद संयुक्त घोषणा हासिल करने में सफल रहता है, तो यह उसकी कूटनीतिक क्षमता की बड़ी सफलता मानी जाएगी। वहीं, अगर युद्ध और रणनीतिक मतभेदों के कारण BRICS किसी साझा रुख पर नहीं पहुंच पाता, तो संगठन के विस्तार और उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।

इसलिए भारत के लिए BRICS Summit 2026 केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत को कूटनीतिक प्रभाव में बदलने की बड़ी परीक्षा भी है।

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